कारगिल युद्ध के वीर विक्रम बत्रा

विक्रम बत्रा

विक्रम बत्रा

ये वीर किस मिट्टी के बने होते है,इन्हे किसी से डर नही लगता है, जान किसी और की खतरे मे होती है सीना ये अपना आगे कर देते है।
इन्ही वीरो मे से एक थे कैप्टन विक्रम बत्रा
जन्म- 09 सितम्बर 1974 पालमपुर, हिमाचल प्रदेश, भारत
देहांत– 7 जुलाई 1999 (24)
दस्ता– 13 जम्मू-कश्मीर रायफल
अन्य नाम– लव , शेरशाह , कारगिल का शेर

पालमपुर के जी. एल. बत्रा के घर 2 जुड्वा बच्चो का जन्म हुआ, जिनमे से एक लव ( विक्रम बत्रा) तथा दुसरे का नाम कुश रखा ।
विक्रम बत्रा के अन्दर देश प्रेम की भावनाएं सेना छावनी विध्यालय के अनुसाशन देख कर जाग्रत हुवी।
विक्रम बत्रा ने पढ़ाई करने के बाद विक्रम चंडीगढ़ चले गए और डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई शुरू कर दी। इस दौरान वह एनसीसी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुने गए और उन्होंने गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया। उन्होंने सेना में जाने का पूरा मन बना लिया और सीडीएस (संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा) की भी तैयारी शुरू कर दी। हालांकि विक्रम को इस दौरान हांगकांग में मर्चेन्ट नेवी में भी नौकरी मिल रही थी जिसे इनके द्वारा ठुकरा दिया गया।
सेन्य जीवन
सी डी एस के द्वारा सेना मे चयनित हुवे, जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। तथा उन्होने सेन्य प्रतिज्ञा मे कहा की ” अब तक माँ पिता का था अब से इस तिरंगे का हुआ।
दिसंबर 1997 में प्रशिक्षण समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसम्बर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद विक्रम को कैप्टन बना दिया गया।
विक्रम बत्रा को कमाडो ट्रेनिंग के बाद जून 1999 को कारगिल युद्घ मे भेजा गया।
कारगिल से पुर्व विक्रम बत्रा छुटियो पर अपने घर पालमपुर आये तो उनके मित्रो ने कहा की युद्घ छीड गया है तो आप जरा सम्भल कर रहना, तो विक्रम बत्रा ने जवाब दिया की ” चिंता मत कीजिये या तो अपना तिरंगा लहरा कर आउगा या तिरंगे मे लिपट कर आउगा “
जरा सोचिएगा जिस वीर की जबान पर एसे अंगारे थिरकते हो उसके बाजुओ मे केसी ताकत फडकती होगी।

5140 चोटी पर विजय

श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त विक्रम बत्रा के नेतृत्व मे किया गया, 5140 तोलोलींग द्ररे की सबसे उंची चोटी है, चोटी की 500 मीटर की खडी चढ़ाई बहुत ही मुश्किल थी, तथा सुबह से पहले फतह जरुरी थी, विक्रम बत्रा को दिलेरी से लडता देख कर बाकी जवानो जोश बढ गया
चोटी पर विजय के बाद उन्होने रेडियो के जरिये अपने विजय उद्दोष ” ये दिल मांगे मोर “( जीत की ललक मे और चोटियों को फतह करना है ) कहा।

5140 चोटी

4875 चोटी पर विजय-
सेना ने 4875 पर कब्जे का अभियान विक्रम बत्रा के नेतृत्व मे शुरू किया ,इस पहाडी की ढाल 80* थी तो चढाई मुश्किल थी ,विक्रम बत्रा ने तेज बुखार के बावजूद पकिस्तानी सेना पर मोत बन कर टुट पडे
इसी दौरान अपने साथीयो के मिल कर पाक सेना को खदेड दिया, तथा इसी दौरान लगे जख़्मो के कारण अतुल्य साहस का प्रदर्शन करते हुवे वीरगती को प्राप्त हुवे । चोटी पर लहराता हुआ तिरंगा मानो अपने सपूत के प्रण पर नाज कर रहा था जो उसने पुरा किया
4875 चोटी को बत्रा टॉप कहा जाता है
इस देशप्रेम के के दौरान विक्रम बत्रा की प्रेम कहानी अधूरी रह गई, उनके कारगिल से आते ही उनकी शादी उनकी प्रेमिका से होने वाली थी, और आज भी वो उनके इन्तज़ार है।

सम्मान
कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टीनेंट कर्नल वाई.के. जोशी ने विक्रम को शेर शाह उपनाम से नवाजा था, तथा कारगिल का शेर भी कहा जाता है।
इस अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया जो 7 जुलाई 1999 से प्रभावी हुआ।

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